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Kanwar Yatra Jal Abhishek~कांवड़ यात्रा पूर्ण

Kanwar Yatra Jal Abhishek~कांवड़ यात्रा पूर्ण
This year's Kanwar Yatra Jal Abhishek~कांवड़ यात्रा पूर्ण

Thursday, 09 Aug - 2018

Kanwar Yatra 2018 Dates | Kawad Yatra 2018 Dates | Kawad Yatra 2018

Kanwar Yatra जलाभिषेक Date : Thursday 09th August 2018 (Triyodashi)

Kanwar Yatra जलाभिषेक Time: Friday 10th August 2018 (Chaturdashi) 00:06 to 00:51 in the Night.

Kanwar Teerth yatra starts on 28th July 2018, the first day of the month of Sawan. It will be for two weeks. 

कांवड़ एवं कांवड़ यात्रा : कांवड़ यात्रा अथवा कांवर यात्रा, शिव के भक्तों की वार्षिक तीर्थ यात्रा है, जिन्हें कांवड़िया कहा जाता है। ये शिव भक्त उत्तराखंड में हरिद्वार, गौमुख और गंगोत्री जैसे तीर्थ स्थानों पर गंगा नदी से पवित्र गंगा जल लाने के लिए प्रत्येक वर्ष जाते है, जिसे बाद में उनके स्थानीय शिव मंदिरों में शिवलिंग पर अर्पित किया जाता है। हिन्दू कैलेंडर के अनुसार कांवड़ यात्रा श्रावण (सावन) (जुलाई-अगस्त) के पवित्र महीने के दौरान होती है।

कांवड़ यात्रा का नाम कांवड़ के नाम पर रखा गया है, एक एकल दंड (आमतौर पर बांस से बना होता है) जिसके दोनों विपरीत सिरों से दो गंगा जल पात्र जिनमे लगभग बराबर भार होता है लटकाये जाते है। कांवड़ एक या दोनों कंधों पर दंड के बीच संतुलन करके पकड़ते हुए रखा जाता है। कांवड़-ले जाने वाले तीर्थयात्रियों, जिन्हें कांवड़िया कहा जाता है, उनके कंधों पर दंड से बंधे गंगा जल पात्रों झुलाते हुए रखा जाता हैं।धार्मिक तीर्थयात्रा के रूप में कांवड़ ले जाने का यह अभ्यास, विशेष रूप से भगवान शिव के भक्तों द्वारा व्यापक रूप से पूरे भारत में पालन किया जाता है।

श्रावण का महीना भगवान शिव को समर्पित है और अधिकांश भक्त महीने के दौरान सोमवार को उपवास रखते हैं, क्योंकि यह चतुरमास काल के दौरान भी आता है। परंपरागत रूप से शिव भक्त धार्मिक तीर्थयात्राओं के लिए अलग हो जाता है, पवित्र नदियों में स्नान और तपस्या करता है। वार्षिक मानसून के मौसम के दौरान  हरिद्वार, गंगोत्री या गौमुख(जो गंगा माँ का उद्गम स्थल है) तथा अन्य पवित्र स्थान जैसे सुल्तानगंज, एकमात्र जगह जहां नदी अपना जल प्रवाह उत्तर में बदलती है से गंगा जल ले जाने वाले करोडो भगवा-पहनावा तीर्थयात्री अपने अपने जन्मस्थानो को जल लेकर लौट आते है जहां वे बाद में स्थानीय शिव मंदिरों में शिवलिंग अभिषेक करके भगवन शिव को धन्यवाद करने के संकेत के रूप में करते हैं।

जबकि अधिकांश तीर्थयात्री पुरुष होते हैं, कुछ महिलाएं भी यात्रा में भाग लेती हैं। अधिकांश भक्त पैदल चलकर यात्रा पूरी करते हैं, कुछ साइकिल, मोटर साइकिल, स्कूटर, मिनी ट्रक या जीप पर भी यात्रा करते हैं। कुछ स्वैच्छिक संगठन तथा स्थानीय हिंदू संगठन जैसे कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद इस समय व्यवस्था और यात्रा को सफल बनाने के लिए सहयोग करते है। यात्रा के दौरान राष्ट्रीय राजमार्गों पर शिविर आयोजित किये जाते है, जहां भोजन, आश्रय, चिकित्सा सहायता और गंगा जल धारण की हुई कांवड़ झुलाने की व्यवस्था की जाती है।

कांवड़ यात्रा के नियम विधि तथा महत्व : श्रावण मास का शुभारम्भ होते ही भगवान भोले जो आशुतोष अर्थात शीघ्र प्रसन्न होने वाले हैं,को प्रसन्न करने का विधान प्रारम्भ हो जाता है।घरों में भी प्राय श्रद्धालु शिवालयों में जाकर सावन मास में भगवान शिव का जलाभिषेक,दुग्धाभिषेक,करते हैं। कोई सम्पूर्ण माह व्रत रखता है तो कोई सोमवार को व्रत रखता है, परन्तु सबसे महत्पूर्ण आयोजन है यात्राएँ जिनका गंतव्य शिव से सम्बन्धित देवालय होते हैं।

सम्पूर्ण भारत में भगवान् शिव का जलाभिषेक करने के लिए भक्त अपने कन्धों पर कांवड़ लिए हुए (कांवड़ में कंधे पर बांस तथा उसके दोनों छोरों पर गंगाजली रहती है) गोमुख (गंगोत्री) तथा अन्य समस्त स्थानों पर जहाँ भी पतित पावनी गंगा विराजमान हैं,से जल लेकर अपनी यात्रा के लिए निकल पड़ते हैं.

कांवड़ यात्रा वास्तव में एक संकल्प होती है, जो श्रद्धालु द्वारा लिया जाता है। कांवड़ यात्रा के दौरान कांवड़ियों द्वारा नियमों का पालन सख्ती से किया जाता है। कांवड़ यात्रियों के लिए किसी भी प्रकार का नशा वर्जित रहता है। इस दौरान तामसी भोजन यानी मांस, मदिरा आदि का सेवन भी नहीं किया जाता।बिना स्नान किए कांवड़ यात्री कांवड़ को नहीं छूते।तेल, साबुन, कंघी करने व अन्य श्रृंगार सामग्री का उपयोग भी कावड़ यात्रा के दौरान नहीं किया जाता। स्त्री,पुरुष,बच्चे ,प्रौढ़ परस्पर एक दूसरे को भोला या भोली कहकर ही सम्बोधित करते हैं.कांवड़ ले जाने के पीछे अपना संकल्प है कुछ लोग “खडी कांवड़ ” का संकल्प लेकर चलते हैं,वो जमीन पर कांवड़ नहीं रखते पूरी यात्रा में.

कांवड़ यात्रा में बोल बम एवं जय शिव-शंकर घोष का उच्चारण करना तथा कांवड़ को सिर के ऊपर से लेने तथा जहां कांवड़ रखी हो उसके आगे बगैर कांवड़ के नहीं जाने के नियम पालनीय होती है। पैरों में पड़े छाले,सूजे हुए पैर,केसरिया बाने में सजे कांवड़ियों का अनवरत प्रवाह चलता ही रहता है अहर्निश ! स्थान -स्थान पर कांवड़ सेवा शिविर आयोजित किये जाते हैं,जिनमें निशुल्क भोजन,जल,चिकित्सा सेवा,स्नान विश्राम आदि की व्यवस्था रहती है।मार्ग स्थित स्कूलों,धर्मशालाओं ,मंदिरों में विश्राम करते हुए ये कांवड़ धारी ,रास्ते में स्थित शिवमंदिरों में पूजार्चना करते हुए नाचते गाते है।  बम बम बोले बम भोले की गुंजार के साथ शिवरात्री (श्रावण कृष्णपक्ष त्रयोदशी +चतुर्दशी) को जलाभिषेक करते हैं। देश के अन्य स्थानों में किसी न किसी न किसी रूप में सम्पूर्ण श्रावण मास में ऐसे ही विशिष्ठ आयोजन रहते हैं।

श्रावण मास की शिवरात्रि से लगभग १० -१२ दिन पूर्व से चलने वाला यह जन जनसैलाब आस्था,श्रद्धा विश्वास के सहारे ही अपनी कठिन थकान भरी यात्रा पूरी करता है। अंतिम दो दिन ये यात्रा अखंड चलती है जिसको डाक कांवड़ कहा जाता है। निरंतर जीप,वैन ,मिनी ट्रक ,गाड़ियाँ,स्कूटर्स,बाईक्स आदि पर सवार भक्त अपनी यात्रा अपने घर से गंतव्य स्थान की दूरी के लिए निर्धारित घंटे लेकर चलते हैं। और अपने इष्ट के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं.बहुत सी कांवड़ तो बहुत ही विशाल होती हैं जिनको कई लोग उठाकर चलते हैं। इस तरह कठिन नियमों का पालन कर कांवड़ यात्री अपनी यात्रा पूर्ण करते हैं। इन नियमों का पालन करने से मन में संकल्प शक्ति का जन्म होता है।


Kanwar or Kanwad Yatra : The Kanwar Yatra or Kavad Yatra is annual pilgrimage of devotees of Lord Shiva, known as Kānvarias. These Shiva devotee goes to Hindu pilgrimage places like Haridwar, Gaumukh and Gangotri in Uttarakhand to fetch holy water (Ganga Jal) of Ganges River , which is later offered to Shivlinga at their local Shiva temples. Kanwar Yatra takes place during the sacred month of Shravan (Sawan) (July -August), according to the Hindu Vikrami Samvat Calendar.

Kanwar Yatra is named after the kānvar ,That is a single pole (usually made of bamboo) which have two almost equal weight and sized pots hung on its both opposite ends.The kānvar is carried by balancing the middle of the pole on one or both shoulders. Kanvar-carrying pilgrims, called Kānvarias, carry covered water-pots in kanvars slung across their shoulders. This practice of carrying Kavad as a part of religious pilgrimage, especially by devotees of Lord Shiva, is widely followed throughout India.

The month of Shravan is dedicated to
Lord Shiva and most devotees observe a fast on Mondays during the month, as it also falls during the chaturmas period. Traditionally devotee set aside for religious pilgrimages, bathing in holy rivers and penance. During the annual Monsoon season thousands of saffron-clad pilgrims carrying Ganga Jal from the Ganges in Haridwar, Gangotri or Gaumukh, the glacier from where the Ganges originates and other holy places on the Ganges, like Sultanganj, the only place where the river turn north during its course, and return to their hometowns, where they later they perform Abhisheka (anointing) the Shivalingas at the local Shiva temples, as a gesture of thanks giving.

While most pilgrims are men, a few women also participate in
Kanwar Yatra. Most travel the distance on foot, a few also travel on bicycles, motor cycles, scooters, mini trucks or jeeps. Numerous Hindu organizations and other voluntary organizations like local Kanwar Sanghs, the Rashtryia SwayamSewak Sangh and the Vishwa Hindu Parishad setup camps along the National Highways during the Yatra, where food, shelter, medical-aid and stand to hang the Kanvads, holding the Ganges water is provided.

Significance, Rules and Process of Kanwad Yatra : With the start of month Shravan, the process of appeasing Bhagwaan Bhole, who is known as name Ashutosh(means to be pleased very soon) is beginning to make him happy. In the houses, often devotees go to the Shivalingas and perform Jalabhishek, Dugdhabhishek, to Lord Shiva in the Sawan Month. Some devotee perform fast for the whole month,some perform on Monday, but the most important event is the Kanwar Yatra whose destination is to reached to Shiva related Temples.

In order to Jalbhisheka of Lord Shiva in the whole of India, devotees are wearing
kanwad on their shoulders (in Kanwar Gangajal in pots on both ends of bamboo and weared on shoulders), and take out Gangajal for their journey  from Gomukh (Gangotri) and all other places wherever there are descendants of Ganga.

Kawad Yatra is indeed a resolution, which is taken by the devotee. The rules are followed strictly by the devotees during the journey of
Kanwad. Any kind of intoxicant is prohibited for the Kanwadiyas. During this time, devilish food ie meat, liquor, etc. is not to be eat.The Kanwariyas does not touch the Kanwad without bathing.The use of oil, soap, combs and other makeup materials is also not used during the Kanwad Yatra. Women, men, children, and adults interact with each other by calling each other as Bhola or Bholi. It is resolution of each to take the Kanwad. Some people take the pledge of Khadi Kawnad, they do not put kanvad on any place expect shoulders.  

The rules for uttering the Bol Bambb and Jai Shiva Shankar chants in Kawand yatra, and
the rules of not going forward from the place where the Kanwad is placed without taking the kanwad and prohibited to move the Kanwad over the head. The continuous flow of Kanwariyas with blisters in the feet, pain in lobes, swollen feet, in saffron cloths keeps running! Kawadiya Service Camps are organized at the place to place, which include free food, water, medical service, bath rest etc.While resting in the schools, Dharmashalas, temples, on the way, they perform singing dancing while worshiping in the Shiv Temples. They perform Jalabhishek for Shivaratri on (Shravan luner dark side Triyodashi + Chaturdashi) with the humiliation of Bamb Bam Bam Bam Bhole. In other places of country there are also such special events in the entire Shravan month in some form are performed.

This rush of devotee Kanwariyas, running from around 10-12 days prior to the festival of Shravan Shivaratri, is completing his difficult tired journey with the help of faith, devotion and belief. In the last two days, these journey runs unbroken, which is called the Daak Kawnad. During the last days by jeep, van, mini trucks, trains, scooters, bikes etc., devotees take their journey from their home to the destination in fixed time hours. And express their favour of devotion towards
Lord Shiva. Many Kanwars are very vast, which raised by many Kanwariyas with unity.  Following the tough rules like this, the Kanwadiyas complete their journey. By following these rules, determination power is generate in the mind.
 

 
 
 
 
 
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  When is Karwa Chauth in 2018, 28 October 2018, Sunday
  When is Ahoi Ashtami 2018, 31 October 2018, Wednesday
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