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Sarvapitri Amavasya 2020 Date~सर्वपितृ अमावस्या

Sarvapitri Amavasya 2020 Date~सर्वपितृ अमावस्या
This year's Sarvapitri Amavasya 2020 Date~सर्वपितृ अमावस्या

Thursday, 17 Sep - 2020

 Sarvapitri Amavasya 


Sarva Pitru shraddh | Mahalaya Amavasya


According to Hinduism Krishna Paksha of Ashwin Month is celebrated in the form of Shraddh. Description of Shraddh Sanskar can be found  in many religious books of Hinduism. Shraddh Paksha is also known as  Mahalaya or Sarva Pitru Paksha. Other than these, it is also known as Pitra Pandharvada in Maharashtra, Addi Amavasyi in Tamil Nadu and Karikada in Kerela.  Shraddh means to perform ceremonies for the departed souls of dead ancestors so that they can attain peace. It is a ceremony to offer reverence to family, god, ancestors and children.
According to the Hinduism, it is believed that the soul of the dead ancestors of a family residing in the Pitra Lok i.e a realm between the heaven and the earth visit earth at the time of Shraddh Paksha or Pitra Paksha. The ceremonies and Tarpan  performed at this time for their peace is known as Shraddh. Thus, it is believed that whatever we donate in the name of our ancestors is  received by them also.

 

Method of doing Shraddh

The Shraddh involves Pinda-Daan, which is an offering to the ancestors of Pindas with sesame seeds, grass and water. The base of the Shraddha is the devotion and respect towards ancestors. One should follow the rituals as stated below to perform Shraddh.

First of all, wash the feet of all the Brahmins (priest) and make them sit on a clean seat. Deva Paksha brahmin should sit facing east and Pitra Paksha and Matru Paksha brahmin should sit facing the north direction while having food. Worship the gods with a mixture of barley and water and offer them Dhoop, Diya and flowers.

Then, put the sacred thread on the right shoulder and with the permission of the brahmin donate the splint and call the ancestors by chanting the mantras. Now, again seek the permission of the Brahmin and offer the food cooked to the Agni (fire) while chanting, “ Agneya Kavyavahanaya Swaha” “Somaya Pitramate Swaha” followed by serving the food to the brahmins. Sprinkle the sesame seeds on the floor where shraddh is being performed and consider brahmins as your ancestors.  

Importance of Sarva Pitru Shraddha

Amavasya Pitra Paksha is considered to be auspicious to perform Shraddh ceremonies. This Amavasya is also known as Visarjani Amavasya and Mahalaya. Shraddh performed with rituals mentioned in the scriptures brings welfare. People who are unable to perform Shraddh according to the rituals should perform it on the date of the death of their ancestor in Ashwin month for their peace and welfare.

Pitra starts from Bhadrapada Shukla Paksha Purnima and remains till Amavasya.  People who are unable perform Shraddh during the period of 15 days of Pitra Paksha or the people who do not remember the date of death of their ancestors can perform Tarpan on Sarva Pitra Paksha Amavasya. On this day, the ancestors visit their home with a desire of pind-daan or tilanjali and if someone doesn’t perform it, they go back unhappy.  

Mahalaya is also known as Shraddha. Maha means,“day of festival” and alaya means, “home”. Krishna Paksha is the day when ancestors visit earth and if Shraddh is not performed, then they return back to Pitralok unhappy. Shraddh is performed for the peaceful salvation of ancestors, which is also known as Mahalaya. If any family is suffering from Pitradosha and poverty and are not aware of the date of death of their ancestors should perform Sharaddh and Tarpan with proper rituals and devotion on Sarva Pitru Amavasya. 

 

 

 

जो व्यक्ति पितृपक्ष के पन्द्रह दिनों तक श्राद्ध तर्पण आदि नहीं कर पाते अथवा जिन पितरों की मृत्यु तिथि यान न हो, उन सबके निमित्त श्राद्ध, तर्पण, दान आदि सर्व पितृ अमावस्या को किया जाना चाहिए। शास्त्रीय मान्यता है कि अमावस्या के दिन पितर अपने पुत्रादि आदि के द्वार पर पिण्डदान एवं श्राद्ध आदि की आशा से जाते हैं

 

सामान्यत: जीव के जरिए इस जीवन में पाप और पुण्य दोनों होते हैं। पुण्य का फल है स्वर्ग और पाप का फल है नरक। अपने पुण्य और पाप के आधार पर स्वर्ग और नरक भोगने के पश्चात् जीव पुन: अपने कर्मों के अनुसार चौरासी लाख योनियों में भटकने लगता है। जबकि पुण्यात्मा मनुष्य या देव योनि को प्राप्त करते हैं। अत: भारतीय सनातन संस्कृति के अनुसार पुत्र-पौत्रादि का कर्तव्य होता है कि वे अपने माता-पिता और पूर्वजों के निमित्त कुछ ऐसे शास्त्रोक्त कर्म करें जिससे उन मृत प्राणियों को परलोक में अथवा अन्य योनियों में भी सुख की प्राप्ति हो सके। इसलिए भारतीय संस्कृति एवं सनातन धर्म में पितृऋण से मुक्त होने के लिए श्राद्ध करने की अनिवार्यता बताई गई है। वर्तमान समय में अधिकांश मनुष्य श्राद्ध करते तो हैं, मगर उनमें से कुछ लोग ही श्राद्ध के नियमों का पालन करते हैं। किन्तु अधिकांश लोग शास्त्रोक्त विधि से अपरिचित होने के कारण केवल रस्मरिवाज़ की दृष्टि से श्राद्ध करते हैं।

 

वस्तुत: शास्त्रोक्त विधि से किया हुआ श्राद्ध ही सर्वविधि कल्याण प्रदान करता है। अत: प्रत्येक व्यक्ति को श्रृद्धापूर्वक शास्त्रोक्त विधि से श्राद्ध सम्पन्न करना चाहिए। जो लोग शास्त्रोक्त समस्त श्राद्धों को न कर सकें, उन्हें कम से कम आश्विन मास में पितृगण की मरण तिथि के दिन श्राद्ध करना चाहिए। भाद्र शुक्ल पक्ष, पूर्णिमा से पितरों का दिन आरम्भ हो जाता है। जो सर्व पितृ विसर्जन अमावस्या तक रहता है। यद्यपि प्रत्येक अमावस्या पितरों की पुण्य तिथि होती है मगर आश्विन मास की अमावस्या पितरों के लिए परम फलदायी मानी गई है। इस अमावस्या को सर्व पितृ विसर्जनी अमावस्या अथवा महालया के नाम से भी जाना जाता है। जो व्यक्ति पितृपक्ष के पन्द्रह दिनों तक श्राद्ध तर्पण आदि नहीं कर पाते अथवा जिन पितरों की मृत्यु तिथि याद न हो, उन सबके निमित्त श्राद्ध, तर्पण, दान आदि इसी अमावस्या को किया जाता है। शास्त्रीय मान्यता है कि अमावस्या के दिन पितर अपने पुत्रादि के द्वार पर पिण्डदान एवं श्राद्ध आदि की आशा से आते हैं। यदि उन्हें वहाँ पिण्डदान या तिलांजलि आदि नहीं मिलती, तो वे अप्रसन्न होकर चले जाते हैं। जिससे जीवन में पितृदोष के कारण अनेक कठिनाइयों और विघ्न बाधाओं का सामना करना पड़ता है।

 

श्राद्ध विधि

श्राद्धकर्ता पूर्वाभिमुख खड़ा होकर हाथ में तिल, त्रिकुश और जल लेकर यथाविधि संकल्प कर पंचबलि दानपूर्वक ब्राह्मण को भोजन कराए।

पंचबलि विधि

गो-बलि (पत्ते पर): मंडल के बाहर पश्चिम की ओर 'ऊं सौरभेय्य: सर्वहिता:' मंत्र पढ़ते हुए गो-बलि पत्ते पर दें तथा 'इदं गोभ्यो न मम्' ऐसा कहें।

श्वान-बलि

(पत्ते पर): यज्ञोपवीत को कंठी कर 'द्वौ श्वानौ श्याम शबलौ' मंत्र पढ़ते हुए कुत्तों को बलि दें 'इदं श्वभ्यां न मम्' ऐसा कहें।

काक बलि

(भूमि पर): अपसव्य होकर 'ऊं ऐद्रेवारुण वायण्या' मंत्र पढ़कर कौवों को भूमि पर अन्न दें। साथ ही इस मंत्र को बोलें–'इदं वायसेभ्यो न मम्'।

देवादि बलि

(पत्ते पर): सव्य होकर 'ऊं देवा: मनुष्या: पशवो' मंत्र बोलेते हुए देवादि के लिए अन्न दें तथा 'इदमन्नं देवादिभ्यो न मम्' कहें।

पिपीलाकादि बलि

(पत्ते पर): सव्य होकर 'पिपीलिका कीट पतंगकाया' मंत्र बोलते हुए थाली में सभी पकवान परोस कर अपसभ्य और दक्षिणाभिमुख होकर निम्न संकल्प करें। 'अद्याऽमुक अमुक शर्मा वर्मा, गुप्तोऽहमूक गोत्रस्य मम पितु: मातु: महालय श्राद्धे सर्वपितृ विसर्जनामावा स्यायां अक्षयतृप्त र्थमिदमन्नं तस्मै। तस्यै वा स्वधा।' फिर ब्राह्मण भोजन का संकल्प निम्न मंत्र से करना चाहिए। 'पूर्वोच्चारित संकल्पसिद्धयर्थ महालय श्राद्धे यथा संख्यकान ब्राह्मणान भोजयिष्ठे।' ऐसा संकल्प करके अन्नदान का संकल्प जल पितृतीर्थ से नीचे छोड़ दें। पुन: पूर्वाभिमुख होकर 'ऊं गोत्रं नो वर्धना दातारं नोऽभिवर्धताम्' मंत्र से ईश्वर से आशीर्वाद के लिए प्रार्थना करें तथा ब्राह्मण को भोजन कराएँ। सात अक्टूबर 2010 को गजच्छाया जैसे विशिष्ट योग युक्त इस सर्व पितृ विसर्जनी का श्राद्ध होगा।

 


 
 
 
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