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Inspiration - (खुद से मिलना )
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Posted on: 29 Nov, 2012
एक दिन शाम को मैं गंगा किनारे बै ा हुआ था, थोडा उदास सा शांत, जीवन के प्रति पश्चमुखी सोच से ग्रसित। मैं अपने अतीत कि खुशियों को याद कर रहा था, वर्तमान से दुखी (अपरिचित) (अतीत में जीना अच्छा लगता है)। ऐसा लगता था कि जब वापस गाँव जाऊंगा तो फिर खुश हो पाउँगा। “कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन”। अपने भविष्य कि कल्पनाओ में अपने गाँव, अपने लोगों को जोड़कर देख रहा था , मेरे लिए तो बस उतनी ही दुनिया थी। मैं उनके साथ जीने कि कोशिस कर रहा था, पता नहीं था कि वक्त के बहाव में फिर वही स्तिथि प्राप्त नहीं कि जा सकती जिससे आप गुजर चुके हों। नदी शीतल और मंद गति से प्रवाहित थी, वो अपनी ंडी हवा से मुझे सहला रही थी। "मेरा जीवन भी तो तुम्हारी तरह है .क्यों उदास होते हो?" एक आवाज सुनाई दी। मैंने चौक कर इधर-उधर देखा । फिर मैंने नदी की ओर गौर से देखा, मुझे साफ-साफ सुनाई देने लगा, नदी कुछ कह रही थी मुझसे। “मैं भी तुम्हारी तरह ही तो हूँ, क्यों उदास होते हो ? मेरा जीवनचक्र भी तुम्हारी तरह ही है। मैंने पूछा, “ वो कैसे?” नदी ने कहना शुरू किया, “मेरा जन्म सुदूर बर्फीले पहाड़ो में हुआ।“ मैंने अपना बचपन उनके पास उछलते, कूदते मस्ती के साथ बिताया जैसे तुमने अपना बचपन अपने माता-पिता , अपने दोस्तों के साथ अपने गाँव में। फिर मैं बड़ी हुई मैं बाहर जाने कि जिद करने लगी. मेरे पिता (पर्वतों) ने मुझे समझाया कि जाना चाहती हो ,जाओ। इस संसार के सभी चर-अचर प्राणियों की एक नियति होती है, एक उद्देश्य होता है। तुम्हारे जीवन का भी एक लक्ष्य है, और वह है “निरंतर स्वयं को बेहतर बनाना , अपने से उच्चतर अवस्था की ओर गतिमान होना”। तुम्हारा लक्ष्य है सागर से मिलना, और अच्छी बात यह है कि तुम इसे जानती हो, वरना अधिकांश लोग अपने जीवन का लक्ष्य जान ही नहीं पाते। नदी ने आगे कहा, “पिता जी ने मुझसे पूछा था कि" लेकिन तुम्हारा लक्ष्य (सागर) बहुत दूर है। रास्ता अत्यंत क िन , कभी सघन तो कभी विरल जन समुदाय मिलेंगे, कभी बीहड़ मिलेंगे सैकड़ों उतार-चढाव मिलेंगे इस रास्ते मे, .क्या तुम जा सकोगी?" मैंने कहा, “हाँ ! मैं हर जगह जाउंगी। मैं आपका ही प्रवाह मान रूप हूँ। आप जहाँ नहीं पहुंचे ,वहां भी जाउंगी, उन्हें आपकी शीतलता से तृप्त करुँगी और आपका सन्देश दूंगी। मैं उन्हे आपके वजूद का एहसास दिलाउंगी। उन्होंने शशंकित होते हुए पूछा कि हर नदी तो सागर में नहीं मिलती, तब क्या होगा? तब तो तुम्हारी सारी यात्रा व्यर्थ हो जाएगी ? मैंने उन्हे समझाया, “ पिता जी! नदी अपने नाम से नहीं मिलती सागर से, किन्तु उसका तत्व तो किसी रूप में सागर में मिल ही जाता है.। और आपने ही तो सिखाया है, लक्ष्य प्राप्ति से महत्वपूर्ण तो उसके लिए कि जाने वाली यात्रा है, किया गया प्रयास है। हो सकता है कि सूरज दादा कि मदद से मैं अपना रूप बदल के वापस किसी और जगह पहुँच जाउंगी पर अपनी यात्रा जारी रखूंगी, सदैव अपने से बेहतर स्थिति प्राप्त करने के लिए । और तुम देख सकते हो, मैं चल ही रही हूँ, शांत, संयत बिना सोचे कि सागर में मिल पाऊँगी या नहीं! मुझे अपना भविष्य देखने कि प्रेरणा हुई। मैंने खुद कि तुलना नदी से करना शुरू कर दिया। मैं हमेशा अचानक बदलने वाली परिस्थिति से परेशान था, लेकिन ये तो मात्र उतार -चढाव हैं। जब सब साथ होते हैं तो ख़ुशी और जब नहीं होते तो कष्ट होता था, लेकिन ये तो केवल यात्रा में सघन एवम विरल आबादी से गुजरना है। मुझे सब कुछ स्पष्ट दिखने लगा। हम जितना आगे बढ़ते हैं,प्रगति करते हैं उतनी ही दूरी हम अपने परिवार , घर से आगे चले आते हैं। और लौटने का कोई सीधा मार्ग नहीं होता। (हम फिर से अमरुद चुराकर नहीं खा सकते, या किसी गन्ने के खेत में बिना पूछे नहीं घुस सकते....या जामुन नहीं बिन सकते ।) समय के साथ हमसे समाज कि अपेक्षाए बदल जाती हैं, और हमें उसी के अनुरूप खुद को ढालना पड़ता है। लेकिन ये भी सत्य है कि नदी कि तरह ही हमारी प्रगति ,ख़ुशी का श्रोत भी हमारा जन्मस्थान (मूल) ही है। सब कुछ उनके साथ के बिना अधुरा लगता है, वही से हमें ताकत और उर्जा मिलती है। इस तरह से सोचने पर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ कि जीवन कितना आसान है ! हर प्रश्न का जवाब कितना सरल है ! सुख-दुःख ,दोस्त-शत्रु, मिलना-बिछड़ना आदि सभी जीवन यात्रा के पड़ाव मात्र है, जो जीवन में अपने तरीके से कुछ सिखाकर जाते हैं। और वो सीख मेरी यात्रा के लिए आवश्यक होगी या फिर उस यात्रा में काम आयेगी। कई दिन से मैं परेशान था कि मेरा व्यवहार कैसा हो, मैं गर्म विचारधारा को मानु या फिर नरम विचारधारा को, लेकिन अब मैं विचार सागर में गोते लगा रहा था। जब नदी को बांध दिया जाता है, प्रदुषण किया जाता है, जब उसका केवल शोषण किया जाता है, तो वही जीवनदायनी अपना विकराल रूप ले के तबाही लाती है। उसी प्रकार शीतल का स्वाभाव होना , दूसरों को संतुष्टि देना अच्छा है। किन्तु शोषण के विरुद्ध आवाज उ ाने के लिए कहीं से और कुछ मांगना नहीं पड़ता, बल्कि उसका वही जल तबाही ला देने के लिए भी पर्याप्त है। बै ा- बै ा मैं जीवन दर्शन सीख गया। मुझे इस तरह सभी प्रश्नों के उत्तर मिलने लगे, मैं बहुत खुश हुआ। जब मेरी तंद्रा टूटी तो चांद निकल आया था, चाँदनी फैली थी,वो शांत माहौल, गंगा की रेत और चमकता जल शुकून और धैर्य प्रवाहित कर रहा था, मेरे अंदर । “वाकई नदी का जीवन कितनी अनिश्चितताओं से भरा पड़ा है, और हमारा भी !” हमारी अन्तः – प्रेरणा हमें हमेशा रास्ता दिखाती है, इसके साथ केवल शर्त यह है कि निडर हो के अपने दिल कि आवाज़ सुनी जाये। यदि एक बार हृदय बोलना सीख गया तो फिर कहीं और से किसी और प्रेरणा कि आवश्यकता नहीं रहती है। "ब्रह्माण्ड का प्रत्येक कण सिखाने लगता है.".... एक फिल्म आई थी, पिछले दिनों, “ओम शांति ओम” उसी का यह संवाद मन मे घूम गया कि "जब आप किसी को पूरे दिल से चाहते है तो सारी कायनात उससे मिलाने में आपकी मदद करती है" और इस तरह मैं नयी उर्जा से भरा हुआ खुद को हल्का महसूस करने लगा, गुनगुनाता हुआ मैं वापस कमरे की ओर चल पड़ा, मुस्कुराते हुये। कभी-कभी अपने आप से बात कर लेने से कई उलझे प्रश्नों के जवाब मिल जाते हैं.......कोशिश करके देखिये , अच्छा लगता है.....मिलना खुदसे.............
By: Saurabh        Back
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