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Shravan Month (सावन माह) - How to Pray to Shiva~कैसे करे शिव की पूजा
शास्त्रोक्त व पौराणिक कथाओं के अनुसार श्रावण माह में ही समुद्र मंथन किया गया था। मंथन के दौरान समुद्र से निकले विष को भगवान शिव ने अपने कंठ में समाहित कर संपूर्ण सृष्टि की रक्षा की। किन्तु अग्नि के समान तीव्र विष के पान के उपरांत महादेव शिव का कंठ नीलवर्ण हो गया। विष की ऊष्णता को शांत कर भगवान भोले को शीतलता प्रदान करने के लिए समस्त देवी-देवताओं ने उन्हें जल-अर्पण किया। इस कारण भगवान शिव की मूर्ति व शिवलिंग पर जल चढ़ाने का महत्व आज भी है तथा शिव पूजा में जल की महत्ता, अनिवार्यता भी सिद्ध होती है।

इस पवित्र श्रावण मास में शिव-उपासना से भगवान् शिव की विशेष कृपा उनके भक्तों को प्राप्त होती है। शिवपुराण में कहा गया है कि भगवान शिव ही स्वयं जल हैं।

संजीवनं समस्तस्य जगतः सलिलात्मकम्‌

भव इत्युच्यते रूपं भवस्य परमात्मनः

अर्थात्‌ जो पवित्र जल समस्त जगत्‌ के प्राणियों में जीवन का संचार करता है, वह पावन गंगा जल स्वयं उस परमात्मा शिव का रूप है। इसीलिए जल का अपव्यय नहीं वरन्‌ उसका महत्व समझकर उसकी पूजा करना चाहिए।

पार्थिव पूजन का लाभ व महात्यम-

शिवोपासना में पार्थिव पूजा का भी विशेष महत्व होने के साथ-साथ शिव की मानस पूजा का भी महत्व है। प्रत्येक वर्ष इस श्रावण मास में चार से पांच सोमवार पड़ते है। श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि अर्थात रक्षाबंधन पर्व के साथ इस पुण्य पवित्र मास का समापन हो जाता है।

इस मास के प्रत्येक सोमवार को शिवलिंग पर कुछ विशेष वस्तु अर्पित की जाती है जिसे शिवामुट्ठी कहते है। जिसमें प्रथम सावन सोमवार को कच्चे चावल एक मुट्ठी, दूसरे सावन सोमवार को सफेद तिल् एक मुट्ठी, तीसरे सावन सोमवार को खड़े मूँग एक मुट्ठी, चौथे सावन सोमवार को जौ एक मुट्ठी और यदि किसी वर्ष सावन मास में पांच सोमवार आते हो तो पांचवें सोमवार को एक मुट्ठी सतुआ चढ़ाया जाता हैं। जिस वर्ष पांच सोमवार न होकर केवल चार सोमवार होते है तो आखरी सोमवार को दो मुट्ठी भोग अर्पित किया जाता है। 

श्रावण माह में एक बिल्वपत्र से शिवार्चन करने पर शिवभक्त के तीन जन्मों के पापों का नाश होता है। एक अखंड बिल्वपत्र अर्पण करने से कोटि बिल्वपत्र चढ़ाने का फल प्राप्त होता है। शिव पूजा में शिवलिंग पर रुद्राक्ष अर्पित करने का भी विशेष फल व महत्व है। रुद्राक्ष शिव नयन जल से प्रगट हुआ इसी कारण शिव को अति प्रिय है। भगवान शिव की पूजा-अर्चना करने के लिए महादेव को कच्चा दूध, सफेद फल, भस्म तथा भाँग, धतूरा, श्वेत वस्त्र अधिक प्रिय है।

लिंग पूजन क्यों करते है...?

देह से कर्म-कर्म से देह-ये ही बंधन है, शिव भक्ति इस बंधन से मुक्ति का साधन है, जीव आत्मा तीन शरीरो से जकड़ी है स्थूल शरीर- कर्म हेतु, सूक्ष्म शरीर- भोग हेतु, कारण शरीर -आत्मा के उपभोग हेतु, लिंग पूजन समस्त बंधन से मुक्ति में परम सहायक है तथा स्वयंभू लिंग की अपनी महिमा है और शास्त्रों में पार्थिव पूजन परम सिद्धि प्रद बताया गया है। 

शिव आराधना के मंत्र अनुष्ठान-

|| नमोस्तुते शंकरशांतिमूर्ति | नमोस्तुते चन्द्रकलावत्स ||

|| नमोस्तुते कारण कारणाय | नमोस्तुते कर्भ वर्जिताय ||

अथवा

|| ॐ नमस्तुते देवेशाय नमस्कृताय भूत भव्य महादेवाय हरित पिंगल लोचनाय ||

अथवा

|| ॐ नमो भगवते रुद्राय नमः ||

अथवा

|| ॐ दक्षिणा मूर्ति शिवाय नमः ||

अथवा

|| ॐ दारिद्र्य दुःख दहनाय नम: शिवाय ||

अथवा

|| वृषवाहनः शिव शंकराय नमो नमः | ओजस्तेजो सर्वशासकः शिव शंकराय नमो नमः ||

श्रावण मास में शिव की उपासना करते समय पंचाक्षरी मंत्र ॐ नम: शिवाय और महामृत्युंजय आदि मंत्र जप बहुत महत्वपूर्ण माने जाते है। इन मंत्रों के जप-अनुष्ठान से सभी प्रकार के दुख, भय, रोग, मृत्युभय आदि दूर होकर मनुष्‍य को दीर्घायु की प्राप्ति होती है। समस्त उपद्रवों की शांति तथा अभीष्ट फल प्राप्ति के निमित्त रूद्राभिषेक आदि यज्ञ-अनुष्ठान चमत्कारी प्रभाव देते है। श्री रामचरित मानस, शिवपुराण, शिवलीलामृत, शिव कवच, शिव चालीसा, शिव पंचाक्षर मंत्र, शिव पंचाक्षर स्त्रोत, महामृत्युंजय मंत्र का पाठ एवं जाप श्रावण मास में विशेष फल प्रदान करने वाले बताये गए है। 

श्रावण मास में राम कथा-

आपने यह अनुभव किया होगा की श्रावण मास में श्री रामचरित मानस की कथा व पाठ जगह जगह होते है इसका कारण यह है के स्वयं श्री महादेव ने माँ पार्वती से कहा -

|| उमा कहू में अनुभव अपना | सत हरी भजन जगत सब सपना ||

तो इस कारण श्रावण मास में भक्तगण शिव मंदिर में शिव जो को मानस का पाठ सुनाते है और इसका मास परायण सविधि अनुष्ठान करते है। 

 
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