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संसार को मत छोड़ना

 
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संसार को छोड़ने की बात का एक ही अर्थ होता है कि तुम परमात्मा से भी ज्यादा समझदार हो रहे हो। उसने अभी तक संसार नहीं छोड़ा। उसने छोड़ दिया होता संसार तो संसार खो गया होता। वही तो डालता है श्वास प्राणों में। वही तो हरा है वृक्षों में। वही तो गीत गाता पक्षियों में। संसार उसने छोड़ा नहीं है।

और ऐसा भी मत सोचना कि संसार को बना कर परमात्मा दूर हो गया है। उसके बिना संसार जी ही न सकेगा। परमात्मा प्रतिपल संसार बना रहा है। किसी इतिहास की घड़ी में संसार बनाया और फिर हट गया-ऐसा नहीं है। इस क्षण भी सृजन जारी है। नये बीजों में अंकुर आ रहे हैं। नये बच्चे पैदा हो रहे हैं। नये तारे निर्मित हो रहे हैं। प्रतिपल सृजन चल रहा है। संसार को छोड़ोगे, परमात्मा का अपमान करोगे।

इसलिए कहता हूं: संसार को मत छोड़ना, क्योंकि संसार में परमात्मा छिपा है। और परमात्मा को खोजेंगे कहां? संसार के अतिरिक्त और कोई जगह कहां है? भागोगे कहां? जहां जाओगे वहां संसार है। बाजार में संसार है, हिमालय में संसार नहीं? मनुष्यों में संसार है, वृक्षों में संसार नहीं? अगर मनुष्यों में संसार है, तो वृक्षों में भी संसार है। सभी पर उसी एक मालिक के हस्ताक्षर हैं। जाओगे कहां? चाँद तारो पर जाओगे! जहां जाओगे, तुम, वहीं संसार होगा। संसार में ही जा सकते हो।

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