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क्या है जीवन के सच्चे सुखद सम्बन्धो का सार

 
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परिवर्तन संसार का नियम है किन्तु परिवर्तन यदि सार्थक और सही दिशा में होगा तो समाज के लिए कल्याणकारी होगा। यदि परिवर्तन गलत दिशा में होगा तो वह विध्वंसकारी हो जायेगा। 

परिवर्तन सतत चलने वाली चक्रीय प्रक्रिया है समय के साथ परिवर्तन में यदि आज की बात की जाये तो एक सामान्य परिपेक्ष में मानव की आत्महित की प्रवृत्ति बढ़ती ही जा रही है। कुछ समय पहले की तुलना में यदि बात की जाये तो आजकल लोगों का व्यवहार स्वार्थी और आत्मोन्मुख हो गया है जो कि शायद पहले इतना अधिक नहीं होता था। तब लोग आपस में नाते रखते थे, जिनसे वो आत्मीयता के साथ जुड़े होते थे इसीलिए उनमे वो खूब आनंद की प्राप्ति भी करते  थे। सच्चा सुख या आनंद केवल तब ही मिलता है, जब दो लोग एक दूसरे के लिए त्याग, बलिदान और समर्पण का भाव रखते है। एक दूसरे पर पूरा विश्वास रखें, न्योछावर होने और समर्पण की भावना हो, ईमानदारी हों, और एक दूसरे की रेस्पेक्ट हो।

मगर आज के इस समय में तो संबंध बनाए ही इसलिए जाते हैं, यह सब करना पड़े और इन सकारात्मक भावों के बजाय अपने आत्महित को साधने के लिए बनाए जाते हैं। यही कारण है कि आजकल सामाजिक सम्बन्ध तो बहुत दूर रक्त और पारिवारिक सम्बन्ध भी बहुत ज्यादा अधिक समय तक नहीं चल पाते हैं। निजी स्वार्थो, आत्महित के लिए ही संबंध बनते हैं, और बहुत जल्द ही ये बिखर भी जाते हैं। 

यदि किसी के मध्य कोई सम्बन्ध लंबा चलता है, तो निश्चित रूप से उस रिश्ते में बंधे लोगो में आपस में एक-दूसरे के प्रति ईमानदारी, विश्वास और सम्मान  की भावना बिलकुल शुद्ध है। यही वो परिस्थिति होती है जब व्यक्ति को प्रेम और वास्तविक आनंद की अनुभूति होती है। वरना दो-चार दिन के झूठे दिखावो और रिश्तों में तो ये सारी दुनिया ही जी रही है।

मगर मिलावटी और झूठे दिखावों का ये जीवन, असली सुखद जिंदगी और जिंदादिली से बहुत दूर है। असल जीवन की सार्थकता सत्य में है दिखावे और स्वार्थ में नहीं। जीवन में वास्तविक आनंद को प्राप्त करना है तो एक दूसरे के प्रति ईमानदारी, विश्वास और सम्मान का होना बहुत जरूरी है। तभी जीवन में संबंध टिकेंगे जो जीवन को वास्तविक आनंद का अनुभव भी कराएँगे।

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